शंकर दयाल शर्मा की रिपोर्ट - आज नाग पंचमी है और आज के दिन नाग देवता की पूजा करने से मनोवांक्षित फल कि प्राप्ति होती है |सदियों से चली आ रही नाग पूजन कि हमारी इस धार्मिक परंपरा से जुडी कई कहानियां है| नाग देवता से जुड़ी कहानी मगध कि ऐतिहासिक भूमि राजगृह के मनियार मठ से भी है |मनियार का मतलब मनियारा नाग और मठ का मतलब मंदिर या बसेरा होता है |ऐसा माना जाता है कि मगध के प्रतापी राजा जरासंध के द्वारा नाग देवता की पूजा के लिए इस मंदिर को बनवाया गया था जो समय काल में जमींदोज हो गया बाद में इसकी पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई की गई | इसे राजगृह के देवता मणिनाग का मंदिर भी बताया जाता है।पाली ग्रंथों में इसे मणिमाला चैत्य कहा गया है, जबकि महाभारत में मणिनाग मंदिर का उल्लेख आता है।खुदाई में जो अवशेष मिले हैं वह नागों का बसेरा होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है |
इसका व्यास 3 मीटर और दीवार 1.20 मीटर मोटी है। इसकी बाहरी दीवार पर पुष्पाहार से सजे देवताओं की आकृतियां बनी हैं। इनमें शिव, विष्णु, नाग लपेटे गणेश जैसी आकृतियां हैं। छह भुजाओं वाले नटराज शिव की आकृति प्रमुख आकर्षण है। इनमें कई मूर्तियां नष्ट हो चुकी हैं। कला शैली की दृष्टि से इतिहासकार इन मूर्तियों को गुप्तकालीन बताते हैं।
कुंड, चबूतरे और मुख्य मंदिर के आसपास भी कई कलाकृतियां हैं। वैदिक धर्म के बाहर की जनजातियों में सर्प पूजन की परंपरा थी। मगध के लोग नागों को उदार देवता मानते थे, जिन्हें वे पूजा आदि करके संतुष्ट करते थे।इस मटके परिसर में तीन गोलाकार गड्ढे बने हैं इसके बारे में कहा जाता है कि श्रावण मास के नाग पंचमी के दिन यह नाग देवता को प्रसन्न करने के लिए हवन और अनुष्ठान का आयोजन किया जाता था |
इन तीनों गोलाकार गड्ढे में दूर संग्रह किए जाते थे यज्ञ के बाद मठ से निकलकर नाग देवता इस कुंड के दूध को ग्रहण करते थे और लोगों को दर्शन देने के बाद पुनः मठ में चले जाते थे और इसी दूध को लोगों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता था | इस मठ का उलेख चीनी यात्री हेनसांग की डायरी में भी मिलता है | इतिहासकारों का मानना है कि राजा परिक्षित को तक्षक नाग ने डस लिया था जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी उसके बाद उनके पुत्र जन्मेजय उनके शव को लेकर यहां पहुंचे थे और सर्प नष्ट यज्ञ किया था | इसी तरह की कई किवदंतियां और कहानियां इस मनियार मठ से जुड़ी है जो हमारे नाग पूजन की ऐतिहासिक परंपरा को याद दिलाता है | महाभारत काल में इसी राजगृह के जरासंध अखाडा में महा बलशली राजा जरासंध का बध भीम के द्वारा किया गया था | आज भी यह अखाडा राजगृह में मौजूद है जो मगध कि गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है |


Post A Comment: