शिवाजीनगर समस्तीपुर रिपोर्टर पी न्यूज़ सुरेश कुमार सिंह
सुरेश कुमार सिंह की लेख-मृत्यु भोज एक पाखंड:-
ऐसा भोज जो अपनों के मरने के बाद किया जाए दिन रात उनकी याद में आंसू बहाए फिर भी होश करके अपने सामाजिक प्रतिष्ठा को दिखाने के लिए पू forरे समाज को रो कर भोजन करा दें और समाज शांति पूर्वक भोजन ग्रहण कर ले उसे मृत्यु भोज कहते हैं।
प्रियजनों,
मृत्यु भोज संवेदनाओं की आड़ में छुपा एक पाखंड है। मृत्यु भोज एक ऐसी परंपरा है जो गलत होने के बावजूद भी जिसे हम सदियों से सामाजिक प्रतिष्ठा को साबित करने के लिए आज तक ढो रहे हैं।सदियों पहले की परिस्थितियां अलग थी आज की परिस्थितियां अलग है उसे विज्ञान और तर्कशक्ति की कसौटी पर सोचे क्या मृत्युभोज सही है?मृत्यु भोज के संदर्भ में किसी से आप बात करें तो बोलेंगे कि हमारे बाप दादा जो बना गए थे उसको तुम तोड़ना चाहते हो,याद रखिए शिक्षा का अर्थ सिर्फ रोजी रोजगार उपलब्ध कराना नहीं है बल्कि तार्किक व वैज्ञानिक सोच को भी विकसित करना है जिससे एक सुंदर और पाखंड मुक्त विश्व का निर्माण हो सके। यदि आप यह कहेंगे कि हम अपने पूर्वजों द्वारा चलाए गए प्रथा को समाप्त नहीं करेंगे तो आपके पूर्वज तो नरबलि प्रथा, सती प्रथा को मानते थे तो क्या आप मानेंगे ?नहीं ना क्यों ?... वास्तव में मृत्यु भोज समाज का एक कलंक है इसपर आप शांत मन से विचार करें कि जिस माता-पिता ने आप के जन्म पर खुशियां मनाया आपकी खुशी के लिए उसने अपना जीवन का एक कण कण आप पर निछावर किया स्वं धूप और बरसात में जाकर आपको कभी धूप और बरसात का साया तक लगने नहीं दिया और आप उनके मरने के बाद चील ,कव्वे और राक्षस की भांति भोज खाकर और खिलाकर जश्न मना रहे हैं सिर्फ समाज में अपना प्रतिष्ठा जमाने के लिए कि लोग कहेंगे उसने क्या भोज किया? कितना हजारों लोगों को खिलाया? धन्य है आप जैसे लोग? वास्तव में मृत्यु भोज "अन्न दान" के नाम पर झूठा दिखावा है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है -राम के पिताजी गरीब थे उसके पिताजी ने राम के दादा जी के मृत्यु भोज में 50 लोगों को आमंत्रित किया आज राम के पास पैसा है तो उसने अपने पिताजी की मृत्यु भोज में 1000 लोगों को आमंत्रित किया भाई तो यह परंपरा है या दिखावा ?
प्रियजनों मृत्यु भोज पर आप जितना खर्च करते हैं बेहतर होगा कि उस पैसा से आप समाज में कोई सुंदर कार्य करें उदाहरण के लिए छोटा सा सड़क बना दें, सार्वजनिक स्थानों पर यात्री शेड या पेयजल की व्यवस्था करा दें, वृक्ष लगा दे, गरीब बच्चों को उस पैसा से पढ़ा दें, इस प्रकार के अन्य कई सामाजिक कार्यों को किया जा सकता है ऐसे कार्यों से लोग आपके पूर्वजों को जन्म जन्मांतर तक याद करेंगे ।भोज की बात करते हैं भोज तो आपसे बेहतर कल कोई और खिलाएगा लोग आपको भूल जाएंगे ।
निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो मृत्यु भोज करने के पीछे एक संकीर्ण सोच और सामाजिक डर है कि लोग क्या कहेंगे उसके पास था कितना संपत्ति था और वह अपने माता पिता के मृत्यु भोज नहीं किया निसंदेह यह कहीं ना कहीं परंपरा या "अन्नदान" नहीं सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ही दर्शा रहा है,मित्रों आप के शिक्षित होने का फिर क्या उचित रह गया यदि आप उस शिक्षा के माध्यम से अपने समाज की बुराइयों को समाप्त न कर सकें या अपने समाज को नई दिशा ना दे सके ।अतः आप सभी से निवेदन है इस सामाजिक डर से आगे निकलकर मृत्यु भोज जैसे गलत परंपराओं का विरोध करें सामाजिक या परिवारिक रुप से नहीं सही परंतु एक बुद्धिजीवी होने के नाते व्यक्तिगत रूप से ही सही मृत्यु भोज का बहिष्कार करें । यकीन मानिए भारत माता आप जैसे बुद्धिजीवी संतानों के जन्म लेने से गौरवान्वित महसूस करेगी
सुरेश कुमार सिंह की लेख-मृत्यु भोज एक पाखंड:-
ऐसा भोज जो अपनों के मरने के बाद किया जाए दिन रात उनकी याद में आंसू बहाए फिर भी होश करके अपने सामाजिक प्रतिष्ठा को दिखाने के लिए पू forरे समाज को रो कर भोजन करा दें और समाज शांति पूर्वक भोजन ग्रहण कर ले उसे मृत्यु भोज कहते हैं।
प्रियजनों,
मृत्यु भोज संवेदनाओं की आड़ में छुपा एक पाखंड है। मृत्यु भोज एक ऐसी परंपरा है जो गलत होने के बावजूद भी जिसे हम सदियों से सामाजिक प्रतिष्ठा को साबित करने के लिए आज तक ढो रहे हैं।सदियों पहले की परिस्थितियां अलग थी आज की परिस्थितियां अलग है उसे विज्ञान और तर्कशक्ति की कसौटी पर सोचे क्या मृत्युभोज सही है?मृत्यु भोज के संदर्भ में किसी से आप बात करें तो बोलेंगे कि हमारे बाप दादा जो बना गए थे उसको तुम तोड़ना चाहते हो,याद रखिए शिक्षा का अर्थ सिर्फ रोजी रोजगार उपलब्ध कराना नहीं है बल्कि तार्किक व वैज्ञानिक सोच को भी विकसित करना है जिससे एक सुंदर और पाखंड मुक्त विश्व का निर्माण हो सके। यदि आप यह कहेंगे कि हम अपने पूर्वजों द्वारा चलाए गए प्रथा को समाप्त नहीं करेंगे तो आपके पूर्वज तो नरबलि प्रथा, सती प्रथा को मानते थे तो क्या आप मानेंगे ?नहीं ना क्यों ?... वास्तव में मृत्यु भोज समाज का एक कलंक है इसपर आप शांत मन से विचार करें कि जिस माता-पिता ने आप के जन्म पर खुशियां मनाया आपकी खुशी के लिए उसने अपना जीवन का एक कण कण आप पर निछावर किया स्वं धूप और बरसात में जाकर आपको कभी धूप और बरसात का साया तक लगने नहीं दिया और आप उनके मरने के बाद चील ,कव्वे और राक्षस की भांति भोज खाकर और खिलाकर जश्न मना रहे हैं सिर्फ समाज में अपना प्रतिष्ठा जमाने के लिए कि लोग कहेंगे उसने क्या भोज किया? कितना हजारों लोगों को खिलाया? धन्य है आप जैसे लोग? वास्तव में मृत्यु भोज "अन्न दान" के नाम पर झूठा दिखावा है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है -राम के पिताजी गरीब थे उसके पिताजी ने राम के दादा जी के मृत्यु भोज में 50 लोगों को आमंत्रित किया आज राम के पास पैसा है तो उसने अपने पिताजी की मृत्यु भोज में 1000 लोगों को आमंत्रित किया भाई तो यह परंपरा है या दिखावा ?
प्रियजनों मृत्यु भोज पर आप जितना खर्च करते हैं बेहतर होगा कि उस पैसा से आप समाज में कोई सुंदर कार्य करें उदाहरण के लिए छोटा सा सड़क बना दें, सार्वजनिक स्थानों पर यात्री शेड या पेयजल की व्यवस्था करा दें, वृक्ष लगा दे, गरीब बच्चों को उस पैसा से पढ़ा दें, इस प्रकार के अन्य कई सामाजिक कार्यों को किया जा सकता है ऐसे कार्यों से लोग आपके पूर्वजों को जन्म जन्मांतर तक याद करेंगे ।भोज की बात करते हैं भोज तो आपसे बेहतर कल कोई और खिलाएगा लोग आपको भूल जाएंगे ।
निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो मृत्यु भोज करने के पीछे एक संकीर्ण सोच और सामाजिक डर है कि लोग क्या कहेंगे उसके पास था कितना संपत्ति था और वह अपने माता पिता के मृत्यु भोज नहीं किया निसंदेह यह कहीं ना कहीं परंपरा या "अन्नदान" नहीं सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ही दर्शा रहा है,मित्रों आप के शिक्षित होने का फिर क्या उचित रह गया यदि आप उस शिक्षा के माध्यम से अपने समाज की बुराइयों को समाप्त न कर सकें या अपने समाज को नई दिशा ना दे सके ।अतः आप सभी से निवेदन है इस सामाजिक डर से आगे निकलकर मृत्यु भोज जैसे गलत परंपराओं का विरोध करें सामाजिक या परिवारिक रुप से नहीं सही परंतु एक बुद्धिजीवी होने के नाते व्यक्तिगत रूप से ही सही मृत्यु भोज का बहिष्कार करें । यकीन मानिए भारत माता आप जैसे बुद्धिजीवी संतानों के जन्म लेने से गौरवान्वित महसूस करेगी


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